Wednesday, 15 May 2013

कृष्ण भक्त कबीर


व्यक्त ईश्वर के रूप में वह श्री कृष्ण को अपना इष्ट मानते थे और उन्होंने राम शब्द अव्यक्त के लिए प्रयुक्त किया

कबीर जब ज़िंदा थे तब से लेकर आज तक लोग उनको समझ ही नहीं पाए विशेषकर  कबीर के  कथित  चेलों ने उनकी गद्दी भी बना दी, गद्दी का बटवारा भी कर दिया और सब स्वयंभू जगदगुरु हो गए. कोई कहता है वह निराकार ईश्वर को मानते थे कोई कहता है, कबीर स्वयं परमेश्वर थे, वही साकार परमेश्वर हैं और कोई कहता है मैं उनका अवतार हूँ. सब भ्रमित हैं और स्वर्ग से लेकर सतलोक के टिकट बेच रहे हैं.यदि आप निष्पक्ष होकर कबीर के पदों को आत्मसात करें तो आप जान जायंगे कि व्यक्त ईश्वर के रूप में वह श्री कृष्ण को अपना इष्ट मानते थे और उन्होंने राम शब्द अव्यक्त के लिए प्रयुक्त किया, जिसके लिए वह स्वयं कहते हैं - अलख न कथना जाई. सगुण ईश्वर के रूप में कबीर श्री कृष्ण की जगह जगह स्तुति करते हैं प्रमाण स्वरुप श्याम सुन्दर दास की संपादित कबीर ग्रंथावली के कुछ पदों को उदधृत किया जा रहा है.

हमारा धन माधव गोबिंद धरनधर इहै सार धन कहियै।
जो सुख प्रभु गोबिंद की सेवा सो सुख राज न लहियै
इसु धन कारण सिव सनकादिक खोजत भये उदासी।
मन मुकुंद जिह्ना नारायण परै न जम की फाँसी॥
निज धन ज्ञान भगति गुरु दीनी तासु सुमति मन लागी।
जलत अंग थंभि मन धावत भरम बंधन भौ भागी॥
कहै कबीर मदन के माते हिरदै देखु बिचारी।
तुम घर लाख कोटि अस्व हस्ती हम घर एक मुरारी॥3॥

भजि नारदादि सुकादि बंदित, चरन पंकज भांमिनी।
भजि भजिसि भूषन पिया मनोहर देव देव सिरोवनी॥
बुधि नाभि चंदन चरिचिता, तन रिदा मंदिर भीतरा॥
राम राजसि नैन बांनी, सुजान सुंदर सुंदरा॥
बहु पाप परबत छेदनां, भौ ताप दुरिति निवारणां॥
कहै कबीर गोब्यंद भजि, परमांनंद बंदित कारणां॥392॥

अहो मेरे गोब्यंद तुम्हारा जोर, काजी बकिवा हस्ती तोर॥
बाँधि भुजा भलै करि डारौं, हस्ती कोपि मूंड में मारो।
भाग्यौ हस्ती चीसां मारी, वा मूरति की मैं बलिहारी॥
महावत तोकूँ मारौ साटी, इसहि मरांऊँ घालौं काटी॥
हस्ती न तोरै धरै धियांन, वाकै हिरदैं बसै भगवान॥
कहा अपराध संत हौं कीन्हां, बाँधि पोट कुंजर कूँ दीन्हां॥
कुंजर पोट बहु बंदन करै, अजहूँ न सूझैं काजी अंधरै॥
तीनि बेर पतियारा लीन्हां, मन कठोर अजहूँ न पतीनां॥
कहै कबीर हमारे गोब्यंद, चौथे पद ले जन का ज्यंद॥365॥

गोब्यंदे तूँ निरंजन तूँ निरंजन राया।
तेरे रूप नहीं रेख नाँहीं, मुद्रा नहीं माया॥टेक॥
समद नाँहीं सिषर नाँहीं, धरती नाँहीं गगनाँ।
रबि ससि दोउ एकै नाँहीं, बहता नाँहीं पवनाँ॥
नाद नाँही ब्यँद नाँहीं काल नहीं काया।
जब तै जल ब्यंब न होते, तब तूँहीं राम राया॥
जप नाहीं तप नाहीं जोग ध्यान नहीं पूजा।
सिव नाँहीं सकती नाँहीं देव नहीं दूजा॥
रुग न जुग न स्याँम अथरबन, बेदन नहीं ब्याकरनाँ।
तेरी गति तूँहि जाँनै, कबीरा तो मरनाँ॥219॥


बिष्णु ध्यांन सनान करि रे, बाहरि अंग न धोई रे।
साच बिन सीझसि नहीं, कांई ग्यांन दृष्टैं जोइ रे॥...


इन पदों के अलावा भी कई जगह कबीर ने श्री कृष्ण की विष्णु, राम, गोविन्द, माधव रूप में स्तुति की है जो कबीर ग्रंथावली में संकलित है.
वास्तव में कबीर ईश्वर को दोनों रूप में स्वीकार करते थे. कबीर कहते हैं-
'गुण में निरगुन निरगुन में गुन, बात छाडी क्यों बहिए.'
लोग भ्रम में हैं कोई कहता है ईश्वर सगुण है कोई उसे निरगुण कहता है पर दोनों ही नहीं जानते. परमात्मा निराकार भी है और साकार भी है. एक दृष्टि अधूरी है. यह मन का धोखा है.
सावधान होकर सुन कोई उसे सगुण कहेगा कोई निरगुण, निराकार पर वह ऐसा तत्त्व है जिसके विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह सभी कुछ है.
'अलख न कथना जाई.'
वेदान्त और भगवद्गीता इसी अलख को अव्यक्त कहते हैं. सब धर्मों के लोग कहते हैं कि परमात्मा सर्व शक्तिमान है. सर्व शक्तिमान मान कर भी उसे अधूरा मानते हैं. निराकार को मानने वाले उसे आधा ही मानते हैं इसी प्रकार साकार को मानने वाले उसे आधा ही मानते हैं. क्या सर्व शक्तिमान परमात्मा जो निराकार है उसमें साकार होने की सामर्थ नहीं है? इसी प्रकार सर्व शक्तिमान परमात्मा जो साकार है उसमें निराकार होने की सामर्थ नहीं है तो फिर कैसा और क्यों सर्व शक्तिमान हुआ. सर्व शक्तिमान को दोनों रूपों  में स्वीकार करना होगा. यही नहीं उसे सभी गुण दोषों के साथ स्वीकारना होगा तभी पूर्णता है. वह यदि निराकार है तो सृष्टि भी वही है. वह अव्यक्त और व्यक्त दोनों ही है. कबीर  वेदान्त और भगवद्गीता  से इतने प्रभावित थे की वह सृष्टि के कण कण में उसको देखते हैं. स्वयं में उसको अनुभूत करते हैं.
'तेरा साईं तुझ में'