Thursday, 28 July 2011

कल्कि-अवतार


यह ब्लॉग उनके लिए है जो कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा लेकर  कल्कि अवतार और  इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद(MR HALABI SON OF MR ABDULLAH) का मिलान कर रहे हैं और उनको कल्कि अवतार बता रहे हैं. अच्छा है पुनर्जन्म न मानने वाले पुनर्जन्म को मान रहे हैं.  इससे अवतारवाद पुष्ट होता है. मूर्ति पूजा को स्थान मिलता है.

अवतार का अर्थ है अवतरण अर्थात जो अपनी इच्छा से अवतरित हुआ हो. परम बोध को प्राप्त सिद्ध अपनी इच्छा से किसी संकल्प को पूरा करने के लिए जन्म लेता है वह अवतार कहलाता है. अवतार  पुनर्जन्म की अवधारणा है. अवतार को मानने का अर्थ है पुनर्जन्म को मानना. पुनर्जन्म वेज्ञानिक अवधारणा है. सृष्टि में कोई भी वस्तु नष्ट नहीं होती केवल स्वरूप परिवर्तन होता है और जीव को नष्ट नहीं किया जा सकता.
अवतारी पुरुष परम बोध के कारण वह माया के बंधन  से मुक्त होता है अतः जन्म लेते हुए भी अजन्मा कहा जाता है. वह शरीर न होकर परम ज्ञान का पुंज होता है. शरीर तो लीला कार्य के लिए प्रत्यक्ष होता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार श्री विष्णु के अवतारों का परिचय.
1. मत्स्य अवतार : मत्स्य (मछ्ली) के अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, मनु आदि की रक्षा की थी। इसके पश्चात मनु ने पुनः जीवन का चक्र चलाया.
                      
2. कूर्म अवतार : कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने सागर के समुद्र मंथन के समय मंदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। इस प्रकार देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्रप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था।
3. वराहावतार : वराह के अवतार में भगवान विष्णु ने महासागर के प्रकोप से भूमि देवी (पृथ्वी) कि रक्षा की थी, जिसे महासागर ने हिरणाक्ष  के कारण डुबो दिया था. भगवान ने हिरणाक्ष राक्षस का वध भी किया था.
4. नरसिंहावतार : नरसिंह रूप में भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी और प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप का वध किया था.
5. वामन् अवतार : इसमें विष्णु जी वामन्  छोटे कद ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। तीन पग में तीन लोक नापे.
6. परशुराम अवतार: इसमें विष्णु जी ने परशुराम के रूप में क्षत्रियों के  गर्व का  नाश किया। परशुराम अवतार को शास्त्र अंशावतार मानते हैं.
7. राम अवतार: राम ने रावण का वध किया जो रामायण में वर्णित है. मर्यादा की स्थापना की .
8. कृष्णावतार : भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप मे माँ देवकी और वसुदेव  जी के घर मे जन्म लिया था। उनका लालन पालन माँ यशोदा और नंद बाबा ने किया था।अनेक असुरों का संहार किया, भगवद गीता का ज्ञान दिया. अपना विराट रूप दिखाया. परम बोध को अंतिम स्थिति माना. इस अवतार का विस्तृत वर्णन  महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण मे मिलता है.
9. बुद्ध अवतार: इसमें विष्णु भगवान  बुद्ध के रूप में बोधतत्त्व को देने के लिए प्रकट हुए। शास्त्रानुसार बुद्ध अवतार मान्य नहीं है. बुद्ध ने साधना से परम बोध प्राप्त किया न कि जन्म से. अतः अवतार नहीं कहा जा सकता क्योंकि अवतार को जन्म से परम बोध होता है.
10. कल्कि अवतार: इसमें विष्णु भगवान कलियुग के अन्त में आयेंगे और जब भी अवतरण होगा सूर्य प्रकाश की तरह सम्पूर्ण सृष्टि को उनके आगमन का पता चल जायेगा.
यह है श्री हरी विष्णु के जन्म पुनर्जन्म का संक्षिप्त वृतांत. इससे स्पष्ट है अवतार-पुनर्जन्म एक सिक्के के दो पहलू हैं.
पहले पांच अवतारों में श्री भगवान ने स्पष्ट किया कि परम बोध किसी भी जीव को हो सकता है क्योंकि सभी जीव मेरे ही अंश हैं. इसी युग में सन्त ज्ञानेश्वर द्वारा भैंस से कराया शास्त्रार्थ इसका उदाहरण है. यह पांच तात्कालिक अर्थात विशेष परिस्थिति के अवतार हुए. इन्हें  जीव विकास सिद्धांत के रूप में भी जाना जा सकता है.
पुराण कथा साहित्य है, यह शास्त्र नहीं हैं. इनमें कल्पना के माध्यम से ज्ञान दिया है अतः इनसे सार तत्व को लेना ही उचित  है और किसी भी पौराणिक आख्यान को उपनिषद और भगवद्गीता के आधार पर तोला जाना आवश्यक है.
अवतार आयंगे, अवतार लीला संवरण करंगे, पर तुम जो हो तुम वही रहोगे. स्वयं से स्वयं का उद्धार करो. बोध को प्राप्त हो.


Tuesday, 26 July 2011

विष्णु


 विष्णु - अपने अंदर साक्षात दर्शन करें

विष्णु का अर्थ है जो विश्व के कण कण में व्याप्त है. वह आकार में शान्त हैं. उनका शयन सांप के उपर है. उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है. वह आकाश की तरह हैं, क्षीर सागर उनका निवास है .सम्पूर्ण विश्व उन्होंने धारण किया हुआ है. योगी उन्हें ध्यान से जानते हैं.
बड़ा अद्भुत स्वरूप है. शान्त है, निराकार है, सर्वत्र व्याप्त हैं. परन्तु शयन सांप के ऊपर है.
जैसा पिंड वैसा ब्रह्मांड के आधार पर इस स्वरूप को समझा जा सकता है. हमारा brain &spinal chord 
                                                    

सर्पाकार है. जिसे ब्रेन और मेरुदण्ड के चित्र को देखकर समझा जा सकता है. इसमें श्री विष्णु  निद्रावस्था में लेटे रहते हैं. श्री विष्णु (आत्मतत्त्व) परम ज्ञान हैं जो सदा अक्रिय अवस्था में रहते हैं. चेतना के रूप में वह
सम्पूर्ण शरीर में सर्वत्र व्याप्त हैं. सम्पूर्ण सेंट्रल नर्वस सिस्टम सर्पाकार है जहाँ ज्ञान सदा रहता है, जो चेतना का कारण है. हमारा मस्तिष्क नाग के फन के सामान है और  मेरुदंड का अन्त सिरा मूलाधार नाग की पूंछ है.
       
 श्री विष्णु के चरणों में महामाया स्थित हैं जो संसार, सृष्टि का प्रतीक हैं. नाभि कमल में ब्रह्मा जी स्थित हैं जो जीव का प्रतीक हैं अर्थात ज्ञान जीव का कारण है. वह ज्ञान और संसार के  बीचों-बीच में हैं. जीवात्मा की यही स्थिति है.
 परम बलशाली  असुर मधु, केटभ; काम,क्रोध हैं, जो सदा जीव को मारने के लिए लालायित रहते हैं, इनसे मुक्ति के लिए जीव ईश्वर (ज्ञान) की शरण में जाता है. यही ब्रह्मा जी की श्री हरि विष्णु को जगाने की स्तुति है. उनके (ज्ञान) जागने पर ही काम, क्रोध नष्ट होते हैं, यही मधु, केटभ का बध  है.
श्री हरि विष्णु का निवास क्षीर सागर है अर्थात ज्ञान के समुद्र में परमात्मा सदा निवास करते हैं. ध्यान से ही उस परम ज्ञान स्वरूप श्री हरि विष्णु को जाना जा सकता है.
ऊँ तत् सत्

शिवलिंग

प्रत्येक जीव में, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सूक्ष्म रूप से शिवलिंग सबमें स्थित होता है परन्तु मनुष्य में इसका पूर्ण विकास हो जाता है. आईये इसके प्रत्यक्ष एवम साक्षात् दर्शन करें.

                 
                                                
भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर.



सम्पूर्ण भारतवर्ष में शिवलिंग पूजन परम श्रद्धा से किया जाता है. अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परब्रह्म हैं. सावन में शिवालयों में  सुबह से ही भोलेनाथ को रिझाने का क्रम शुरू होता है जो देर रात्रि तक चलता है। पूरे मास शिव भक्त मनवांछित फल की कामना को लेकर अनुष्ठान-पूजन कार्य क्रम होते हैं. इस दौरान महाशिव का का दूध, घृत, दही, शक्कर, गंगाजल, शहद, बिल्व पत्र, पारे,  धतूरे से रूद्री पाठ साथ रूद्राभिषेक का क्रम लगातार जारी रहता है।
महाशिव का लिंग क्या है. आईये इसके प्रत्यक्ष एवम साक्षात् दर्शन करें. प्रत्येक जीव में चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सूक्ष्म रूप से शिवलिंग सबमें स्थित होता है परन्तु मनुष्य में इसका पूर्ण विकास हो जाता है.
जो पिंड में है वह ब्रह्माण्ड में है. इसे जानने के लिए मनुष्य के मस्तिष्क & spinal cord  को ध्यान से देखें .

 
A. pituitary gland  B. cerebrum  C. skull
D. corpus callosum
E. thalamus F. hypothalamus

G. pons
H. cerebellum I. medulla J  spinal cord





Diagram of part of the spinal cord, with the anterior white matter cut way, and two sets of segmental nerve roots



       
The 600000 nerve cells in the deep nuclei send messages out of the cerebellum along their fibres (or axons), which run through the peduncles to a number of nuclei in the brain stem and thalamus. These in turn are connected to the spinal cord and to regions of the cerebral cortex concerned with the control of movement.



अब आप शिव स्वरूप को समझें.
शिव  बुद्धि के अधिष्ठाता हैं. अब मिलान करें.
१-   शिवलिंग  pons +  medulla +  spinal cord   
२-   उपर से नीचे की ओर ज्ञान शक्ति का संचरण. central nervous system.
३-   नाग-       cerebrum
४-   नाग मणि-      thalamus  hypothalamus
५-   सर्प -        nerves
६-   शिवशक्ति-    hypothalamus, the thalamus nuclei ज्ञान शक्ति ओर क्रिया शक्ति का कारण
७-   शिव- ज्ञान शक्ति ओर क्रिया शक्ति के कारण का भी कारण. निराकार आत्मतत्व
८-   योनि-    body(शरीर)
९-   गणेश- cerebellum (LITTLE BRAIN)

hi.wikipedia.org/wiki/शिवलिङ्ग -  को उपरोक्त आधार पर अपने संचित ज्ञान कोश में संशोधन आवश्यक है.
शिव के वास्तविक स्वरूप से अवगत होकर जाग्रत शिव का पूजन करें और महाबुद्धि को प्राप्त हों .श्री भगवान के वचन हैं, मैं बुद्धि रुपी गुहा के अंदर रहता हूँ.

Monday, 25 July 2011

BHAGWADGEETA - 1


 

  कुरुक्षेत्र
               धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
          मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय.१-१.

क्या कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र हैक्या कोई लड़ाई का मैदान धर्म भूमि हो सकता हैक्या हम एक लीक का अनुसरण करते हैंक्या धर्म के नाम पर भय और भ्रम को स्वीकार करना उचित है? गीता के सभी भाष्यकारों ने धर्म के शास्त्रानुकूल अर्थ को क्यों विस्मृत किया?

पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं - हे संजय, कुरूक्षेत्र में भिन्न भिन्न जीव स्वभाव को धारण किए अर्थात भिन्न भिन्न प्रकृति से युक्त शरीरधारी मेरे ओर पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
       धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाला जो है उसे आत्मा कहा गया है और जिसे धारण किया है वह प्रकृति है। धर्म का अर्थ यहॉ जीव स्वभाव अर्थात प्रकृति है, क्षेत्र का अर्थ शरीर से है। अन्यत्र भी इसी बात की पुष्टि हुयी है, 'स्वधर्मे निधनम् श्रेय: पर धर्म: परधर्म: भयावह:', अपने स्वभाव में स्थित रहना, उसमें मरना ही कल्याण कारक माना है। यह धर्म शब्द गीता शास्त्र में अत्याधिक महत्वपूर्ण है तथा सामान्य मनुष्य के लिए स्वधर्म पालन अर्थात स्वभाव के आधार पर जीवन जीना परम श्रेयस्कर श्री भगवान ने बताया है।
 यदि महर्षि व्यास की दृष्टि से देखा जाय तो धर्म का अर्थ है आत्मा और क्षेत्र का अर्थ है शरीर ।
 इस दृष्टि से पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं हे संजय, कुरूक्षेत्र में जहॉ साक्षात धर्म, शरीर रूप में भगवान श्री कृष्ण के रूप में  उपस्थित हैं वहॉ युद्ध की इच्छा लिए मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया।
   गीता की समाप्ति पर इस उपदेश  को स्वयं श्री भगवान ने धर्म संवाद कहा। धर्म अर्थात जिसने धारण किया है, वह आत्मतत्व परमात्मा शरीर  रूप  में जहॉ उपस्थित है, यह ब्रह्मर्षि व्यास जी के चिन्तन में रहा होगा अत: स्वंय आत्मज्ञानी की दृष्टि  से धर्म क्षेत्र का प्रयोग सृष्टि  को धारण करने वाले परमात्मा श्री कृष्ण चन्द्र तथा धृतराष्ट्र के जीव भाव को संज्ञान में लेते हुए धर्म क्षेत्र का प्रयोग जिसे धारण किया है अर्थात जीव स्वभाव के लिए किया गया है, इसलिए धर्म क्षेत्र का प्रयोग यहॉ हुआ है। धर्म संस्थापनार्थाय, से भी इसकी पुष्टि होती है।








Thursday, 14 July 2011

DEVI DURGA

          दुर्गा-दर्शन

        

 भगवती के सात स्वरूपों का प्रत्यक्ष 
            दर्शन


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारणी
त्रतीयं चंद्रघंटेति कुष्मांनडेति चतुर्थकम
पंचमं स्कन्दमातेती षष्ठम कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम
नवमं सिद्धि दात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

शैलपुत्री- सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहिला स्वरूप हैं पत्थर मिटटी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं. इस पूजन का अर्थ प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना है.
ब्रह्मचारिणी- जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप का प्रादुर्भाव है. यहाँ जड़ चेतन का संयोग है. प्रत्येक अंकुरण में इसे देख सकते हैं.
चंद्रघंटा- भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखानरी (वाणी) है.
कुष्मांडा- अंडे को धारण करने वाली; स्त्री ओर पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है जो भगवती की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है.
स्कन्दमाता- पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है अथवा प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता में स्कन्द माता के दर्शन होते हैं.
कात्यायनी- के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता  हैं. यह देवी का छटा रूप है.
कालरात्रि- देवी भगवती का सातवां रूप है जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है.
भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है. महागौरी का आठवां स्वरूप गौर वर्ण है. यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मांतर की साधना से पाया जा सकता है. इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध हो जाता है. इसलिए इसे सिद्धदात्री कहा है.