यह ब्लॉग उनके लिए है जो कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा लेकर कल्कि अवतार और इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद(MR HALABI SON OF MR ABDULLAH) का मिलान कर रहे हैं और उनको कल्कि अवतार बता रहे हैं. अच्छा है पुनर्जन्म न मानने वाले पुनर्जन्म को मान रहे हैं. इससे अवतारवाद पुष्ट होता है. मूर्ति पूजा को स्थान मिलता है.
अवतार का अर्थ है अवतरण अर्थात जो अपनी इच्छा से अवतरित हुआ हो. परम बोध को प्राप्त सिद्ध अपनी इच्छा से किसी संकल्प को पूरा करने के लिए जन्म लेता है वह अवतार कहलाता है. अवतार पुनर्जन्म की अवधारणा है. अवतार को मानने का अर्थ है पुनर्जन्म को मानना. पुनर्जन्म वेज्ञानिक अवधारणा है. सृष्टि में कोई भी वस्तु नष्ट नहीं होती केवल स्वरूप परिवर्तन होता है और जीव को नष्ट नहीं किया जा सकता.
अवतारी पुरुष परम बोध के कारण वह माया के बंधन से मुक्त होता है अतः जन्म लेते हुए भी अजन्मा कहा जाता है. वह शरीर न होकर परम ज्ञान का पुंज होता है. शरीर तो लीला कार्य के लिए प्रत्यक्ष होता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार श्री विष्णु के अवतारों का परिचय.
1. मत्स्य अवतार : मत्स्य (मछ्ली) के अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, मनु आदि की रक्षा की थी। इसके पश्चात मनु ने पुनः जीवन का चक्र चलाया.
2. कूर्म अवतार : कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने सागर के समुद्र मंथन के समय मंदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। इस प्रकार देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्रप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था।
3. वराहावतार : वराह के अवतार में भगवान विष्णु ने महासागर के प्रकोप से भूमि देवी (पृथ्वी) कि रक्षा की थी, जिसे महासागर ने हिरणाक्ष के कारण डुबो दिया था. भगवान ने हिरणाक्ष राक्षस का वध भी किया था.
4. नरसिंहावतार : नरसिंह रूप में भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी और प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप का वध किया था.
5. वामन् अवतार : इसमें विष्णु जी वामन् छोटे कद ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। तीन पग में तीन लोक नापे.
6. परशुराम अवतार: इसमें विष्णु जी ने परशुराम के रूप में क्षत्रियों के गर्व का नाश किया। परशुराम अवतार को शास्त्र अंशावतार मानते हैं.
8. कृष्णावतार : भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप मे माँ देवकी और वसुदेव जी के घर मे जन्म लिया था। उनका लालन पालन माँ यशोदा और नंद बाबा ने किया था।अनेक असुरों का संहार किया, भगवद गीता का ज्ञान दिया. अपना विराट रूप दिखाया. परम बोध को अंतिम स्थिति माना. इस अवतार का विस्तृत वर्णन महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण मे मिलता है.
9. बुद्ध अवतार: इसमें विष्णु भगवान बुद्ध के रूप में बोधतत्त्व को देने के लिए प्रकट हुए। शास्त्रानुसार बुद्ध अवतार मान्य नहीं है. बुद्ध ने साधना से परम बोध प्राप्त किया न कि जन्म से. अतः अवतार नहीं कहा जा सकता क्योंकि अवतार को जन्म से परम बोध होता है.
10. कल्कि अवतार: इसमें विष्णु भगवान कलियुग के अन्त में आयेंगे और जब भी अवतरण होगा सूर्य प्रकाश की तरह सम्पूर्ण सृष्टि को उनके आगमन का पता चल जायेगा.
यह है श्री हरी विष्णु के जन्म –पुनर्जन्म का संक्षिप्त वृतांत. इससे स्पष्ट है अवतार-पुनर्जन्म एक सिक्के के दो पहलू हैं.
पहले पांच अवतारों में श्री भगवान ने स्पष्ट किया कि परम बोध किसी भी जीव को हो सकता है क्योंकि सभी जीव मेरे ही अंश हैं. इसी युग में सन्त ज्ञानेश्वर द्वारा भैंस से कराया शास्त्रार्थ इसका उदाहरण है. यह पांच तात्कालिक अर्थात विशेष परिस्थिति के अवतार हुए. इन्हें जीव विकास सिद्धांत के रूप में भी जाना जा सकता है.
पुराण कथा साहित्य है, यह शास्त्र नहीं हैं. इनमें कल्पना के माध्यम से ज्ञान दिया है अतः इनसे सार तत्व को लेना ही उचित है और किसी भी पौराणिक आख्यान को उपनिषद और भगवद्गीता के आधार पर तोला जाना आवश्यक है.
अवतार आयंगे, अवतार लीला संवरण करंगे, पर तुम जो हो तुम वही रहोगे. स्वयं से स्वयं का उद्धार करो. बोध को प्राप्त हो.