Thursday, 14 July 2011

DEVI DURGA

          दुर्गा-दर्शन

        

 भगवती के सात स्वरूपों का प्रत्यक्ष 
            दर्शन


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारणी
त्रतीयं चंद्रघंटेति कुष्मांनडेति चतुर्थकम
पंचमं स्कन्दमातेती षष्ठम कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम
नवमं सिद्धि दात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

शैलपुत्री- सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहिला स्वरूप हैं पत्थर मिटटी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं. इस पूजन का अर्थ प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना है.
ब्रह्मचारिणी- जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप का प्रादुर्भाव है. यहाँ जड़ चेतन का संयोग है. प्रत्येक अंकुरण में इसे देख सकते हैं.
चंद्रघंटा- भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखानरी (वाणी) है.
कुष्मांडा- अंडे को धारण करने वाली; स्त्री ओर पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है जो भगवती की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है.
स्कन्दमाता- पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है अथवा प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता में स्कन्द माता के दर्शन होते हैं.
कात्यायनी- के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता  हैं. यह देवी का छटा रूप है.
कालरात्रि- देवी भगवती का सातवां रूप है जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है.
भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है. महागौरी का आठवां स्वरूप गौर वर्ण है. यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मांतर की साधना से पाया जा सकता है. इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध हो जाता है. इसलिए इसे सिद्धदात्री कहा है.

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