विष्णु का अर्थ है जो विश्व के कण कण में व्याप्त है. वह आकार में शान्त हैं. उनका शयन सांप के उपर है. उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है. वह आकाश की तरह हैं, क्षीर सागर उनका निवास है .सम्पूर्ण विश्व उन्होंने धारण किया हुआ है. योगी उन्हें ध्यान से जानते हैं.
बड़ा अद्भुत स्वरूप है. शान्त है, निराकार है, सर्वत्र व्याप्त हैं. परन्तु शयन सांप के ऊपर है.
जैसा पिंड वैसा ब्रह्मांड के आधार पर इस स्वरूप को समझा जा सकता है. हमारा brain &spinal chord
सर्पाकार है. जिसे ब्रेन और मेरुदण्ड के चित्र को देखकर समझा जा सकता है. इसमें श्री विष्णु निद्रावस्था में लेटे रहते हैं. श्री विष्णु (आत्मतत्त्व) परम ज्ञान हैं जो सदा अक्रिय अवस्था में रहते हैं. चेतना के रूप में वह
सम्पूर्ण शरीर में सर्वत्र व्याप्त हैं. सम्पूर्ण सेंट्रल नर्वस सिस्टम सर्पाकार है जहाँ ज्ञान सदा रहता है, जो चेतना का कारण है. हमारा मस्तिष्क नाग के फन के सामान है और मेरुदंड का अन्त सिरा मूलाधार नाग की पूंछ है.
श्री विष्णु के चरणों में महामाया स्थित हैं जो संसार, सृष्टि का प्रतीक हैं. नाभि कमल में ब्रह्मा जी स्थित हैं जो जीव का प्रतीक हैं अर्थात ज्ञान जीव का कारण है. वह ज्ञान और संसार के बीचों-बीच में हैं. जीवात्मा की यही स्थिति है.
परम बलशाली असुर मधु, केटभ; काम,क्रोध हैं, जो सदा जीव को मारने के लिए लालायित रहते हैं, इनसे मुक्ति के लिए जीव ईश्वर (ज्ञान) की शरण में जाता है. यही ब्रह्मा जी की श्री हरि विष्णु को जगाने की स्तुति है. उनके (ज्ञान) जागने पर ही काम, क्रोध नष्ट होते हैं, यही मधु, केटभ का बध है.
श्री हरि विष्णु का निवास क्षीर सागर है अर्थात ज्ञान के समुद्र में परमात्मा सदा निवास करते हैं. ध्यान से ही उस परम ज्ञान स्वरूप श्री हरि विष्णु को जाना जा सकता है.
ऊँ तत् सत्
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