धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय.१-१.
क्या कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है? क्या कोई लड़ाई का मैदान धर्म भूमि हो सकता है? क्या हम एक लीक का अनुसरण करते हैं? क्या धर्म के नाम पर भय और भ्रम को स्वीकार करना उचित है? गीता के सभी भाष्यकारों ने धर्म के शास्त्रानुकूल अर्थ को क्यों विस्मृत किया?
पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं - हे संजय, कुरूक्षेत्र में भिन्न भिन्न जीव स्वभाव को धारण किए अर्थात भिन्न भिन्न प्रकृति से युक्त शरीरधारी मेरे ओर पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाला जो है उसे आत्मा कहा गया है और जिसे धारण किया है वह प्रकृति है। धर्म का अर्थ यहॉ जीव स्वभाव अर्थात प्रकृति है, क्षेत्र का अर्थ शरीर से है। अन्यत्र भी इसी बात की पुष्टि हुयी है, 'स्वधर्मे निधनम् श्रेय: पर धर्म: परधर्म: भयावह:', अपने स्वभाव में स्थित रहना, उसमें मरना ही कल्याण कारक माना है। यह धर्म शब्द गीता शास्त्र में अत्याधिक महत्वपूर्ण है तथा सामान्य मनुष्य के लिए स्वधर्म पालन अर्थात स्वभाव के आधार पर जीवन जीना परम श्रेयस्कर श्री भगवान ने बताया है।
यदि महर्षि व्यास की दृष्टि से देखा जाय तो धर्म का अर्थ है आत्मा और क्षेत्र का अर्थ है शरीर ।
इस दृष्टि से पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं हे संजय, कुरूक्षेत्र में जहॉ साक्षात धर्म, शरीर रूप में भगवान श्री कृष्ण के रूप में उपस्थित हैं वहॉ युद्ध की इच्छा लिए मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया।
No comments:
Post a Comment