Monday, 30 May 2011

SAGUN-NIRGUN / सगुण-निर्गुण



                                                                          सगुण

सगुण उपासना का अर्थ है सभी गुणों में परमात्मा का चिन्तन करना.अपने स्वभाव में रहते हुए प्रत्येक कार्य को परमात्मा का कार्य समझना.उनका उठना बैठना ,सोना ,खाना,पीना ,व्यवसाय आदि सभी कार्य परमात्मा के लिए होते हैं. साक्षीभाव से अपने  शरीर, मन, बुद्धि,  अहंकार ,इन्द्रियों के कार्यों को देखना.चिन्तन से परमात्मा से जुडना,अपने आत्म रूप में परमात्मा के दर्शन करना और सभी भूतों में विश्वात्मा के दर्शन करना.जगत को ब्रह्ममय देखना.प्रथ्वी, जल, अग्नि ,वायु ,आकाश आदि सब जगह जड़ चेतन में परमात्मा को महसूस करना.                       

                                                                       निर्गुण

परमात्मा अव्यक्त है जिसे इन्द्रिय मन बुद्धि द्वारा नहीं जाना जा सकता है. परमात्मा महत ब्रह्म (प्रकृति ) से भी महत है.अष्टांग योग विधि ,कुण्डलनी जागरण आदि से मन सहित इन्द्रियों को वश में करते हुवे अव्यक्त को अनुभव करना.वह अव्यक्त तुरीयातीत अवस्था है वहाँ शून्य भी समाप्त हो जाता है ज्ञान समाप्त हो जाता है अर्थात ज्ञान की क्रिया शक्ति, शून्य होकर शांत हो जाती है.वहाँ अनहद भी समाप्त हो जाता है.वहाँ परमात्मा का संकल्प भी स्तिथ हो जाता है.  

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