योग
यो़ग के विषय में अनेक भ्रांतियां जन मानस में प्रचलित हैं और कतिथ योगियों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए इसका खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है. आज यह एक ब्रांड बन गया है, यह करोड़ो का बाजार है.
योग का सीधा सरल अर्थ है जोड़ अर्थात परमात्मा से जोड़. जो परमात्मा से पूर्ण रूप से जुड़ गया वह योगी है. अन्य जो प्रयासरत हैं वह साधक हैं. इसी प्रयास का एक अंग है सन्यास.
योग आसन नहीं है. आसन का विधान केवल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया गया है. कुछ योगियों ने श्वास व आसान को जोड़कर योग साधन के उन्नत तरीके विकसित किये पर इसके लिए कुशल योगी और कुशल शिष्य आवश्यक हैं. श्वास-प्रश्वास के साथ आसन और बंध एक विशेष योग साधना है जो भीड़ को नहीं दी जा सकती है. परन्तु इसकी भी अंतिम उपलब्धि सीमित है. इस साधना के साथ बुद्धि योग का सहारा लेकर आगे का मार्ग तय किया जाता है. योग की अंतिम स्तिथि है परमज्ञान. परम योगी भगवान श्री कृष्ण चंद्र भगवदगीता में सन्यास योग सिद्ध महत्मा के लक्षण बताते हुए कहते हैं. समत्व योगी, हानि-लाभ, जय-पराजय, निंदा- स्तुति, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, जीवन-मृत्यु में सामान रहता है, उसके लिए मिटटी- सोना सामान है, वह सभी में स्वयं को देखता है, उससे कोई कष्ट नहीं पाता, वह किसी से उद्विग्न नहीं होता, और इस संसार में उदासीनवत रहता है. निष्काम कर्म योग एक अलग साधना है. स्वयं श्री कृष्ण का जीवन है इसका उदाहरण है.
जहाँ तक सन्यासी का जीवन है वह एक कठोर तप है. दैनिक शारीरिक क्रियाओं के अलावा अन्य सांसारिक कार्य वर्जित हैं.
आज योग व धर्मं के नाम से कई हजार करोड़ का कारोबार फल फूल रहा है. काला धन यहाँ सफ़ेद होता है. ट्रस्ट इसका जरिया बन गए हैं. सरकार द्वारा इस विषय में विधान आवश्यक है.
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