Wednesday, 15 June 2011

अवतार


               अवतार

वेदान्त कहता है मैं ही ब्रह्म हूँ, इसका आशय था अपने को शरीर मत समझो सदा स्वयं को ब्रह्म समझते हुए ब्राह्मी स्थिति को पाने का सतत प्रयत्न करो. अपने अंदर सुप्त ब्रह्मशक्ति को जगाओ. वेदान्त कथन अहम् ब्रह्मास्मि का इस शदी में जम कर दुरुपयोग हो रहा है. कुछ स्वयं को भगवान घोषित कर देते हैं, कुछ को उनके चेले भगवान बना देते हैं.
        ईश्वरीय अवतार किसे कहते हैं? उसके क्या लक्षण हैं? जाग्रत ब्रह्म शक्ति सम्पन्न के क्या लक्षण हैं जिससे एक सामान्य बुद्धियुक्त भी उसे पहचान सके.
       जन्म से जाग्रत ब्रह्म शक्ति सम्पन्न व्यक्ति रूप सिद्ध होता है. वह चिर युवा रहता है. उसके शरीर में कभी भी प्रोढ़ता, बृद्धावस्था नहीं आती. उसके शरीर से दिव्य गंध निकलती है, विशेषकर चरणों से. यहां तक कि उनकी बिष्ठा से भी सुगंध आती है अतः कोई भी पशु उस बिष्ठा में मुँह नहीं मारता. जड़ चेतन स्रष्टि उसकी इच्छानुसार आचरण करती है. उसके जन्म लेते ही अनेक दिव्य योगी सन्त दर्शन लेने लगातार आते रहते हैं. वह कभी भी किसी पर चाहे वह शत्रु हो या मित्र उत्तेजित नहीं होता. दण्ड देते समय भी उसके हृदय में करुणा होती है. वह कभी रोगग्रस्त नहीं होता. उसकी स्वास सदा सम चलती है. कोई भी विद्या, भाषा वह तत्काल सीख लेता है. वह प्रत्येक स्थिति में सामान रहता है. विभन्न समयों में लीला करते हुए अमानुष कार्य उनके द्वारा किये जाते हैं. बिना किसी बीमारी के किसी निमित्त को कारण बनाकर वह देह त्याग करते हैं. श्री राम, श्री कृष्ण ऐसे ही अवतारी पुरुष हुए हैं. इसलिए उन्हें ईश्वर कहा जाता है.
   कुछ अवतारी पुरुषों में ब्रह्म शक्ति अल्प अथवा मध्यम मात्रा में जाग्रत होती है, इनमे मिले जुले लक्षण मिलते हैं. कई साधक भी अपने तप से ब्रह्म शक्ति न्यूनाधिक रूप में जाग्रत कर लेते हैं उनमें सामान्यतः कोई विशेष लक्षण नहीं दिखायी देते परन्तु अनेक ईश्वरीय शक्ति से वह सम्पन्न होते हैं. इन पुरुषों को सन्त, परमहंस कहा जाना ही उचित है. 

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