सत् असत्
सत् का अर्थ है जो नित्य है, सदा है, एक सा रहता है, जो पहले भी था आज भी है और कल भी रहेगा. किसी भी परिस्थिति में उसमें परिवर्तन नहीं होता है. वह निश्चित है. इसलिए परमात्मा को सत् कहा गया.
लोग असत् का अर्थ झूठ समझते हैं परन्तु वेदान्त और दर्शन ग्रंथों में असत् माया, भ्रम, अज्ञान, जड़ के लिए प्रयुक्त हुआ है. असत् का अर्थ है जो आज है, अभी है पर कुछ देर बाद या कल नहीं है. संसार को इस कारण असत् कहा गया क्योंकि संसार अथवा पदार्थ नित्य नहीं हैं वह सदा विनष्ट होते रहते हैं.
शंकराचार्य का कथन
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या
इसी सत् असत् को सूत्र बद्ध करता है. इस विषय में यह भी महत्वपूर्ण है कि जगत का प्रत्येक परमाणु सत् का विस्तार है परन्तु परमाणु या जगत सत् नहीं है परमाणु का अनादि कारण सत् है अर्थात जिसके कारण परमाणु की सत्ता है वह सत् है. यदि गहराई से जानें तो असत् है ही नहीं. अज्ञान अथवा भ्रम
से असत् का बोध होता है.
श्री भगवान भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के सोलहवें श्लोक में कहते हैं
असत्
की सत्ता
नहीं सत्
का नहीं
अभाव
तत्व
ज्ञानी जानता
इनका विषय
विचार ।। 16।।
सृष्टि
का मूल
तत्व सत्
है, वही
नित्य है, सदा
है। असत्
जिसे जड़
या माया
कहते हैं, यह
वास्तव में
है ही
नहीं। जब
तक पूर्ण ज्ञान
नहीं हो
जाता तब
तक सत्
और असत्
अलग अलग दिखायी
देते हैं।
ज्ञान होने
पर असत्
का लोप
हो जाता
है वह ब्रह्म
में तिरोहित
हो जाता
है। उस
समय न
दृष्टा रहता
है न दृश्य।
केवल आत्मतत्व
जो नित्य
है, सत्य
है, सदा
है, वही
रहता है।
परम् ब्रह्म परमेश्वर का ही विस्तार ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ईश्वर और ईश्वर की माया है यह लौकिक संसार है इसलिए असत्य कुछ भी नहीं है सभी प्राणी आकास वायु अग्नि जल पृथ्वी ईश्वर मय हैं। इसीलिए भक्त प्रहलाद को सभी जगह ईश्वर महसूस होते थे। राम ने अयोध्या वासियों से एक साथ मिले और कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया था। ऐसी कृपा सब पर नहीं संभव है। लेकिन ईश्वर सभी भक्तों के दिल-दिमाग में रहते हैं इतना पर्याप्त है। ईश्वर की कृपा से असंभव भी संभव है।
ReplyDeleteसपना तो सपना है यह लौकिक संसार भी खुले आंखों से दिखाई पड़ने वाला सपना है क्योंकि मृत्यु के बाद परिदृश्य भिन्न हो जाता है। हकीकत मृत्यु के बाद पता लगता है। ऐसी धारणा ईश्वर के कृपा बगैर संभव नहीं है।